चंद्रशेखर वर्मा | बलौदाबाजार जिला मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर ग्राम धाराशिव प्रदेश का ही नहीं शायद देश का पहला क्वारेंटाइन सेंटर होगा जो पॉलीथिन और बांस की खपच्चियों से बनाया गया हो, वो भी खुले मैदान में। और तो और यहां रहने वाले संदिग्ध मरीजों ने चारपाई और बिस्तर भी अपने घरों से मंगवाए हैं।
इन झोपड़ियों में कुल 191 संदिग्ध रखे गए हैं। बताना जरूरी है कि मंगलवार को इसी धाराशिव से 20 मरीज और निकले हैं। बारिश शुरू हो चुकी है, सोचने का विषय है कि आंधी, पानी, गरज, जहरीले सर्प-बिच्छुओं और कीड़े मकोड़ों का भय भी बना ही रहेगा। इनमें छोटे बच्चे और बुजुर्ग भी शामिल हैं। इस सेंटर में तीन गर्भवती महिलाएं भी हैं।उल्लेखनीय हैं कि क्वारेंटाइन सेंटरों में बार-बार साबुन से हाथ-पैर धोने, अलग टॉयलेट, एक दूसरे के संपर्क में आने से बचने का प्रावधान है लेकिन इन झोपड़ियों में ये सारे प्रावधान दरकिनार कर दिए गए हैं।
पंचायत ने दे दी बांस व झिल्ली कहा- खुद कर लो व्यवस्था
12 जून को झिल्ली तानकर 22 परिवारों के 71 लोगों के अस्थायी निवास बनाए गए जो महाराष्ट्र के अकोला व हैदराबाद के ईंट-भट्ठे में काम करके लौटे थे। गांव के तीन शासकीय भवन पहले से ही प्रवासी श्रमिकों से भरे पड़े हैं तो वही गांव के एक निजी मकान को भी किराए पर लेकर वहां 36 श्रमिकों को रखा गया है। जब गांव में कोई शासकीय और निजी भवन नहीं बचा तो स्कूल परिसर के मैदान में ही झिल्ली से झोपड़ियां बनानी पड़ीं। 120 लोग फिर 16 जून को महाराष्ट्र से लौटे तो नई झोपड़ियां उन्होंने खुद बनाई। पंचायत ने उन्हें मटेरियल देकर कहा कि खुद बना लो।
सरपंच की विवशता मजदूर अपना गांव छोड़ने को तैयार नहीं
सरपंच बंशीलाल चेलक के मुताबिक गांव से 800 लोग बाहर गए थे,जिसमें अभी 450 लोग लौट चुके हैं। उनका कहना है मजबूरी है सबको झोपड़ियों में रखने की, क्योंकि गांव में अब कोई किराए का भवन बाकी नहीं। सरपंच ने बताया कि गांव में शासकीय भवन और एक किराए का निजी मकान तो पहले ही श्रमिकों से भरा हुआ है। यहां लगातार कोरोना पॉजिटिव सामने आने की वजह से हम क्वारेंटाइन मजदूरों को समय खत्म होने पर भी घर नहीं जाने दे रहे हैं, इस भय से कि कहीं वह घर जाकर पॉजिटिव निकल गया तो परेशानी बढ़ जाएगी। गांव लौटने वालों को बलौदाबाज़ार के मंडी परिसर में रखा जा सकता है पर मजदूर गांव छोड़कर वहां रहने को तैयार नहीं हैं। हमें विवशता में झोपड़ियों में रखना पड़ रहा है।
दो सेंटरों में तो अभी तक टेस्ट ही नहीं हुए
धाराशिव में शासकीय प्राथमिक शाला में 7 मई को 98 लोग शिफ्ट किए गए। वहीं दूसरे सेंटर हॉस्टल और हाईस्कूल जो प्राथमिक स्कूल से करीब आधा किलोमीटर दूर हैं,वहां 12 से 25 मई के बीच 102 लोग आए। इसमें हाईस्कूल में 50 लोगों को तो हॉस्टल में 52 लोगों को और 9 तारीख को लौटे 36 लोगों को गांव के किराए के एक निजी भवन में क्वारेंटाइन किया गया है। इन सेंटरों से एक भी श्रमिक का कोरोना टेस्ट नहीं हुआ है क्योंकि किसी में भी लक्षण नहीं दिखे हैं।
खाना भी खुद ही बना रहे, शौच के लिए जंगल का सहारा
इन झुग्गियों में क्वारेंटाइन लोग अपना खाना खुद बना रहे हैं। पंचायत ने इन्हें राशन उपलब्ध करा दिया है। इसी तरह शौच के लिए जंगल जा रहे हैं अलबत्ता पानी की व्यवस्था के लिए पंचायत टैंकर लगवाएं हैं। यानी नहाना-धोना सब खुले में हो रहा है।
ये जीवटता मजदूरों मेंही हो सकती है
गांव लौटे श्रमिक लखन गिरी, गेंद गेंडरे, उमेद, राजू, दुरपति, सोहद्रा आदि ने बताया कि लॉकडाउन होने के बाद संबंधित शहरों में परेशानी हो रही थी। कुछ हो गया तो घर वालों का क्या होगा ये सोचकर 12 जून को गांव पहुंचे। हालत पहले ही सरपंच ने बता दिए थे कि गांव में जगह नहीं बची है। फिर भी हम गांव में कैसी भी स्थिति में समय काटने की जिद कर आ गए हैं, जो होगा सब मिलकर भुगत लेंगे।
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source https://www.bhaskar.com/local/chhattisgarh/raipur/palari/news/191-migrant-laborers-brought-quarantine-charpoys-from-their-homes-in-their-own-slums-127417500.html
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