दिलीप जयसवाल. खेल को लेकर देश की सरकारों का उदासीन रवैया 'दीया तले अंधेरा' की कहावत को चरित्रार्थ करता है। अक्सर कई बार हमारे देश में ओलंपिक में गोल्ड मेडल का सपना देखने वाले एथलीट गरीबी के बोझ में बुरी तरह फंस जाते हैं। ऐसा ही एक मामला छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर का है। यहां राष्ट्रीय स्तर की तीरंदाजी और कुश्ती की खिलाड़ी नेहा कुजूर अपने माता पिता के साथ धान की रोपाई करा रही हैं। ताकि विदेश में प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए जमीन गिरवी रखजो उन्होंने कर्ज लिया था उसे धान बेचकरचुका सकें।
नेहा ने बताती हैं कि उसके पिता गांव के कोटवार हैं। इतनी आमदनी नहीं कि मुझे विदेश भेज सकें। इसलिए 2019 में जब अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में नेहा थाईलैंड जाने वाली थी तो उन्होंने 30 हजार रुपए में खेत गिरवी रख दिया था। नेहा पासपोर्ट बनवाकर दिल्ली तक गई, लेकिन नाबालिग होने के कारण और साथ में अभिभावकों के नहीं होने से उसे एयरपोर्ट से विदेश नहीं जाने दिया गया। नेहा कहती है कि वो तो पहले भी खेत में धान की रोपाई करती रही है, लेकिन तब अवकाश के दिनों में ही रोपा लगाती थी। अब कर्ज पटाने की चिंता है तो खुद अपने माता-पिता के साथ काम कर रही है।
उन्होंने बताया किवह नेपाल में भी खेल चुकी है।तब उसे सर्टीफिकेट के साथ मेडल से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा दिल्ली और नागपुर में आयोजित नेशनल प्रतियोगिता में भाग लेकर कई मेडल अपने और टीम के नाम कर चुकी हैं। नेहा सरगुजा इलाके के बतौली ब्लाॅक के ग्राम कछारडीह की है।
खाने भर का बचाकर, इस साल बेचेगी पूरा धान
नेहा का कहना है किइस साल जमीन कम होने से धान का भी उत्पादन कम हो जाएगा। पहले उनके खेत में 40 क्विंटल धान होता था, लेकिन इस साल आधा ही होगा। ऐसे में आधा धान खाने के लिए रखेंगे और बाकी को बेचकर गिरवी रखी जमीन को छुड़वाएंगे। उसकी दीदी भी फुटबाॅल खेलतीं थी, लेकिन खेल प्रतियोगिताओं में बाहर जाने के लिए पैसा लगता था। इसलिए उसने भी खेलना बंद कर दिया। अब वो रायपुर में एक पुलिस अधिकारी के यहां काम करती हैं।
25 हजार की विधायक ने की थी मदद
सीतापुर विधायक अमरजीत भगत ने खेल प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए 25 हजार रुपए की मदद की थी। हालांकि इतने पैसे में विदेश जाना संभव नहीं था। इसलिए जमीन को गिरवी में रखना पड़ा।
नेहा पड़ोसियों की भी खेती में करेगी मदद
नेहा ने बताया कि एक बार तो उसके नाना-नानी ने 20 हजार कर्ज दिया था। जिससे वह दूसरे राज्य खेलने गई थी जो माता पिता ने सब्जी बेचकर उधार चुकता किया है। इस साल भी वह अपने पड़ोसियों से अपने खेत में इस शर्त पर काम करवा रही है कि बदले में वह भी काम कर देगी। इससे उनकी खेती में कम पैसा लगेगा।
कर्ज लिया ताकि गांव और देश का नाम रोशन हो
नेहा के पिता विदेश्वर कुजूर 8वीं तक पढ़ाई किए हैं। उन्होंने कहा कि मुझे पता है कि नेहा के खेलने से आर्थिक फायदा हमें नहीं होगा, लेकिन यह सोचकर कर्ज लिया कि अगर नेहा खेल में आगे बढ़ेगी तो लोग मुझे जानेंगे या नहीं लेकिन हमारे गांव और देश का नाम रोशन जरूर होगा।
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source https://www.bhaskar.com/local/chhattisgarh/bilaspur/ambikapur/news/daughter-could-play-abroad-so-parents-pledged-land-now-planting-loans-in-the-field-to-repay-the-debt-127524222.html
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