छत्तीसगढ़ स्पांज आयरन मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ने पीएम मोदी को पत्र लिखकर आयरन ओर पेलेट निर्यात पर 30 फीसदी शुल्क लगाने की जो मांग की है, उसका विरोध शुरू हो गया है। स्टील बाजार के जानकारों का कहना है कि पिछले 10 साल के आंकड़ों पर नज़र डालें तो साफ हो जाता है कि छत्तीसगढ़ में न तो लौह अयस्क की कमी है और न ही आयरन ओर पेलेट की। इसके बाद भी इस मांग के पीछे कच्चा माल उपलब्ध कराने वालों के बीच नूरा-कुश्ती कराकर बड़ा मुनाफा कमाने की कहानी छिपी हुई है।
छत्तीसगढ़ से जुड़ी कंपनियों की उत्पादन क्षमता अधिकतम 97 लाख टन प्रतिवर्ष है जबकि उनका वास्तविक उत्पादन लगभग 53.69 लाख टन प्रतिवर्ष है। इन कंपनियों को छत्तीसगढ़ औद्योगिक विकास निगम के जरिए एनएमडीसी उचित दर पर लौह अयस्क उपलब्ध कराता है। विडंबना यह है कि स्थानीय कंपनियां निर्धारित कच्चे माल का आधा हिस्सा भी नहीं उठा पाती हैं जिसका सीधा नुकसान उत्पादकों को होता है। स्टील बाजार के जानकारों के मुताबिक 2019-20 में एनएमडीसी ने 54 लाख टन लौह अयस्क का उत्पादन किया लेकिन स्थानीय उद्योगों ने सिर्फ 20.02 लाख टन की खरीदी की। यानी लगभग 60% कच्चा माल डंप हो गया। 2013-14 में भी ऐसा ही हुआ था। इसी तरह से 2019-20 में रायपुर, दुर्ग और राजनांदगांव के प्लांटों से लगभग 55.30 लाख टन उत्पादित पेलेट में से मात्र 8.8 लाख टन का निर्यात किया।
ऐसे में 2019-20 में एनएमडीसी का 60 फीसदी माल क्यों नहीं उठाया गया और 16.03 फीसदी आयरन ओर पेलेट के निर्यात की क्यों आवश्यकता पड़ी? दूसरी ओर सरकार इस निर्यात पर शुल्क लगा देती है तो इससे निर्यात थम जाएगा। इसलिए पीएमओ को शुल्क संबंधी कोई भी फैसला करने से पहले गंभीरता से विचार करना चाहिए।
ओडिशा के खदान मालिकों की यह कोशिश
आंकड़ों की पड़ताल में एक तथ्य यह निकलकर सामने आया कि जब पेलेट का विकल्प नहीं था तब एनएमडीसी के भाव मनमाफिक स्तर पर लाने ये व्यवसायी ओडिशा के खदानों से कम कीमत खरीद कर अपनी जरूरत की पूर्ति कर लेते थे। इस दबाव में एनएमडीसी को भी भाव गिराने बाध्य होना पड़ता था। इसी खेल में मात खाने के बाद स्पांज आयरन उत्पादक, पेलेट उत्पादकों पर निर्यात शुल्क लगाने की मांग कर रहे है।
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source https://www.bhaskar.com/local/chhattisgarh/raipur/news/there-is-no-shortage-of-iron-ore-and-iron-ore-pellets-yet-opposition-to-the-demand-for-30-duty-on-exports-127535700.html
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