असगर खान | भारत में महामारी अधिनियम 123 साल पहले यानी प्रथम विश्वयुद्ध के बाद प्लेग फैलने के समय लाया गया लेकिन रायपुर में तब इस कानून के तहत एक भी कार्रवाई का रिकार्ड नहीं है। वकीलों के मुताबिक इस कानून के तहत संभवत: पहली एफआईआर सितंबर 1994 में यहां दर्ज हुई थी। तब सूरत में प्लेग फैला था और वहां मजदूरी करने वाले कई लोग यहां लौटकर आए थे। इन्हें आइसोलेशन में रखा गया था पर भागने की वजह से महामारी कानून का केस दर्ज हुआ था। राजधानी में कोविड के पहले लाॅकडाउन यानी 19 मार्च को इस कानून के तहत कार्रवाई शुरू हुई और अब हालत ये है कि इस कानून की अलग-अलग धाराओं में 5 महीने में केवल राजधानी में सैकड़ों एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं।
इतिहासकार रमेंद्रनाथ मिश्रा के मुताबिक महामारी कानून 1897 में ब्रिटिश शासन ने तब बनाया जब बंबई स्टेट में बूबोनिक प्लेग ने महामारी का रूप लिया था। तब इस अधिनियम को लागू किया गया था और केवल 4 धाराएं थीं। लेकिन रायपुर में असर नहीं था, इसलिए यहां तब एक भी केस दर्ज नहीं हुआ।
आजादी के बाद लेकिन राज्य बनने से पहले रायपुर में इस कानून के तहत पहली कार्रवाई संभवत: सितंबर 1994 में की गई थी। उस समय सूरत में प्लेग फैला था। रायपुर के मजदूर वहां की हीरा और कपड़ा फैक्ट्रियों में काम करते थे। बीमारी फैलने की वजह से वे वापस आ गए थे और रायपुर समेत प्रदेश में खतरा बढ़ गया था। तब उन्हें आइसोलेट किया गया था और जो शासन का निर्देश नहीं मान रहा था, उनके खिलाफ रायपुर में महामारी अधिनियम के तहत कार्यवाही की गई थी। इनमें वह लोग ज्यादा थे, जो अस्पताल से भाग गए थे।
हर उल्लंघन पर इसी कानून में केस
इस अधिनियम का उपयोग उस समय किया जाता है, जब किसी भी राज्य या केंद्र सरकार को इस बात का भरोसा हो जाए कि राज्य व देश में कोई बड़ा संकट आने वाला है। कोई खतरनाक बीमारी प्रवेश कर चुकी है और लोगों में फैल सकती है। ऐसी स्थिति में केंद्र व राज्य दोनों इस अधिनियम के प्रावधानों को लागू कर सकते हैं। कोरोना काल में इस कानून का बड़े पैमाने पर उपयोग हुआ है। लॉकडाउन, कंटेनमेंट जोन, हाॅटस्पाॅट से लेकर सरकार के निर्देशों के उल्लंघन पर इसी कानून में कार्रवाई हुई है। इस कानून की खास बात ये है कि आईपीसी की धारा-188 ने सजा केे लिए इसका सपोर्ट किया है। इस एक्ट के सेक्शन-3 में जुर्माने का प्रावधान है। छह माह तक की सजा व जुर्माना इस कानून के तहत लगा सकते हैं।
कई राज्यों में हो चुका इस्तेमाल
भारत के कई राज्यों में महामारी या रोग फैलने पर यह एक्ट लागू किया जा चुका है। 1959 में हैजा के प्रकोप को देखते हुए ओड़िशा सरकार ने पुरी जिले में इस अधिनियम को लागू किया था। 2009 में पुणे में जब स्वाइन फ्लू फैला था, तब इस एक्ट के सेक्शन 2 को लागू किया गया था। 2018 में गुजरात के वडोदरा जिले के एक गांव में 31 लोगों में कॉलरा के लक्षण मिलने, 2015 में चंडीगढ़ में मलेरिया और डेंगू की रोकथाम के लिए और अभी 2020 में कर्नाटक ने सबसे पहले कोरोना वायरस से निपटने के लिए महामारी अधिनियम-1897 को लागू किया गया।
प्रदेश में महामारी कानून 1897 में ये कार्रवाई
- सार्वजनिक स्थानों पर मास्क या फेस कवर नहीं लगाने पर 100 रुपये का जुर्माना।
- होम क्वारेंटाइन के दौरान नियमों का उल्लंघन करने पर 1000 रुपए का जुर्माना।
- सार्वजनिक जगहों पर थूकने पर 100 रुपए का जुर्माना।
- दुकानों में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं कराने वाले दुकानदारों से 200 रुपये का जुर्माना।
- दो से अधिक बार जुर्माना होने पर दुकान सील करने की कार्रवाई।
- हॉटस्पॉट जगह पर सैंपल नहीं देने वालों पर सीधे एफआईआर।
मार्च-अगस्त के बीच सैकड़ों केस
- मास्क नहीं पहनने वालों से - 37 लाख
- थूकने गंदगी फैलाने वालों से - 03 लाख
- फिजिकल दूरी नहीं रखने वालों से - 05 लाख
- लॉकडाउन में दुकान खोलने पर - 3.5 लाख
- कुल जुर्माना - 51.5 लाख से ज्यादा
- औसतन हर दिन 50 से 70 हजार की वसूली की जा रही नियम तोड़ने वालों से।
- अब तक अलग अलग श्रेणियों में 70 हजार से ज्यादा लोगों पर कार्रवाई हो चुकी है।
- सबसे ज्यादा मास्क नहीं पहनने वाले 44 हजार से ज्यादा लोग हैं।
- सार्वजनिक जगहों पर थूकने वालों पर सबसे कम कार्यवाही हो रही है। ऐसे लोगों की जांच का सिस्टम ही नहीं।
"जो लोग लापरवाही बरत रहे हैं केवल उन्हीं पर ही कार्यवाही की जा रही है। जो लोग नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं केवल उन्हीं से ही जुर्माना वसूल किया जा रहा है। लोगों की सुरक्षा के लिए नियमानुसार अफसर काम कर रहे हैं।"
-डॉ. एस भारतीदासन, कलेक्टर रायपुर
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source https://www.bhaskar.com/local/chhattisgarh/news/epidemic-laws-first-action-in-raipur-in-september-1994-26-years-later-since-march-19-hundreds-of-firs-fines-also-127656041.html
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