6 माह में पैसेंजर ट्रांसपोर्ट बिजनेस में 500 करोड़ का नुकसान, कोरोना के चलते कारोबार हो जाएगा ठप

कोरोना संक्रमण ने राजधानी में पैसेंजर ट्रांसपोर्ट (बस सर्विस) की कमर तोड़ दी है। हर महीने 90 से 100 करोड़ का बिजनेस करने वाले इस सेक्टर और इससे जुड़े सैकड़ों परिवारों के सामने बड़ी समस्या खड़ी हो गई है। अन्य कारोबार तो लॉकडाउन खुलने के बाद पटरी पर लौटने लगे हैं, लेकिन ट्रांसपोर्ट सेवा कोरोना संक्रमण रहते तक उबर नहीं पाएगा। पेशे से जुड़े कई बस आपरेटर, ड्राइवर और कंडक्टर तक ने दूसरा धंधा शुरू कर दिया है।
राजधानी में छोटी-बड़ी तीन हजार से ज्यादा बसें हैं। 10 हजार से ज्यादा लोग रोज बसों में सफर करते हैं। इनमें राज्य के भीतर और दूसरे राज्यों तक चलने वाली बसें शामिल हैं। करीब छह हजार परिवार सीधे तौर पर बस सेवा से जुड़े हुए हैं। इनमें ट्रांसपोर्टर, ड्राइवर कंडक्टर इत्यादि शामिल हैं। मार्च से लॉकडाउन के कारण थमे बसों के पहिए अब तक शुरू नहीं हो पाए हैं। मार्च से अगस्त के बीच इन छह महीने में इस बिजनेस को करीब 500 करोड़ का नुकसान हो चुका है। यह नुकसान और बढ़ेगा क्योंकि कोरोना वैक्सीन आने और उसके बाद संक्रमण को नियंत्रित होने में अभी चार से पांच महीने का वक्त और लगेगा।

डीजल का खर्च तक नहीं निकल पाया
पहले चरण का लॉकडाउन खुलने के बाद प्रशासन की अनुमति मिलने पर ऑपरेटरों ने बस चलाने का प्रयास किया था, लेकिन पैसेंजर नहीं मिलने के कारण सप्ताहभर में ही ऑपरेटरों को बस चलाना फिर से रोकना पड़ा। कारण यह था कि 35 से 40 सीटर बस में एक-दो पैसेंजर ही मिल रहे थे। इससे ऑपरेटरों को ड्राइवर, कंडक्टर का खर्च ही नहीं निकल रहा था। डीजल और मेंटनेंस पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा था। इस वजह से ऑपरेटरों ने बस चलाने से फिर इंकार कर दिया।

  • राजधानी में तीन हजार से ज्यादा बसें
  • दो हजार से ज्यादा परिवार प्रभावित
  • हर महीने 90 करोड़ का नुकसान
  • कोरोना के रहते भविष्य अनिश्चित

इनकम नहीं, नुकसान ही नुकसान हो रहा
बस आपरेटर भावेश दुबे ने कहा कि पिछले छह महीने और आगे कितने महीने तक धंधा चौपट रहेगा कहा नहीं जा सकता। इस दौरान आमदनी तो शून्य है लेकिन खर्च कम नहीं है। बस यदि महीनेभर तक नहीं चलीं तो उसपर लंबा-चौड़ा खर्च बैठ जाता है। इसलिए मेंटनेंस जरूरी होता है। इसपर हजारों रुपए खर्च होते हैं। मेंटनेंस न कराया जाए तो 15 से 25, 30 लाख और उससे भी महंगी कीमत की बसों को कबाड़ होने में समय नहीं लगता। टैक्स इत्यादि भरना भी जरूरी होता है। छोटे-बड़े सभी बस ऑपरेटरों की स्थिति खराब है। जिनकी एक-दो बसें हैं उन्हें भी नुकसान और 50-100 बसों वालों को भी नुकसान है।



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पंडरी बस स्टैंड पर बस वालों को सवारियों का इंतजार।


source https://www.bhaskar.com/local/chhattisgarh/raipur/news/500-crore-loss-in-passenger-transport-business-in-6-months-due-to-corona-business-will-come-to-a-standstill-127618662.html

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