दस साल का था, तब एक दिन चाचा हमारे गांव पलनर आए थे। वे पहले ही नक्सलियों से जुड़े थे। मुझे साथ में लेकर चले गए। मुझे बताया कि हम आदिवासियों को अपने जल-जंगल और जमीन की लड़ाई लड़़नी होगी। अपनी आजादी के लिए हमें ही बंदूक उठाना होगा। नासमझी में मैं नक्सलियों के साथ जुड़ गया। मुझे ट्रेनिंग दी गई। पहले तो जुनून था, लेकिन धीरे-धीरे सच्चाई सामने आने लगी। जंगल में दर-दर भटकना पड़ता था। खाने-पीने का कोई भरोसा नहीं था। हर वक्त भय सताता रहता था। 2016 से मैं डिप्टी कमांडर बन गया था। कई बार घर लौटने का विचार आया, लेकिन लौट नहीं पाया। आखिरकार 12 साल बाद रक्षाबंधन पर बहन लिंगे की याद आई। लिंगे ने अगर सरेंडर नहीं कराया होता तो मैं आगे भी बहुत परेशान होता। आज मैं आजादी की जिंदगी जी रहा हूं। मेरी बहन ने मुझे सही रास्ता दिखाया। मैं राखी की हमेशा इज्जत रखूंगा। देश की सेवा करुंगा।
डरती थी, कहीं भाई मारा न जाए...आज वह आजाद हो गया
मल्ला और हम पांच भाई-बहन हैं। चाचा के साथ दस साल की उम्र में गांव जाने के बाद लौटा ही नहीं। चाचा नक्सली संगठन में थे। उसे भी शामिल कर लिए। जब पता चला तो बहुत तकलीफ हुई। जब भी किसी नक्सली के एनकाउंटर की खबर मिलती तो डर सताता था कि कहीं भाई न मारा जाए। हमेशा उसकी सलामती की दुआ करती थी। 12 साल बाद जब वह अचानक घर आया तो उसे नक्सलियों के चंगुल से आजाद कराने का निर्णय लिया। राखी बांधने से पहले पहले पुलिस के पास ले गई और उसे सरेंडर कराया। अब चिंतामुक्त हूं। भाई भी नक्सलियों के चंगुल से आजाद हो गया है।
-लिंगे कड़ती, मल्ला की बहन
नक्सली कमांडर जीतरू को पत्र
सरेंडर के बाद मैं अच्छी जिंदगी जी रहा हूं। जनता का चावल खाकर कब तक जंगल में छिपते-छिपाते घूमते रहोगे। जल-जंगल-जमीन का बहाना बनाकर आदिवासियों को नक्सली गुमराह कर रहे हैं। मैं अब आजाद हो गया हूं। परिवार के साथ हूं। दो वक्त का भोजन भी मिल रहा है। नौकरी मिल गई है। तुम भी आकर सरेंडर कर लो।’
-मल्ला
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source https://www.bhaskar.com/local/chhattisgarh/raipur/news/gun-was-stopped-for-water-forest-land-now-i-am-free-after-surrender-127619533.html
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