श्राद्ध पक्ष बुुधवार से शुरू हुआ। इसी के साथ पितरों के निमित्त 16 दिवसीय अनुष्ठान भी शुरू हो गया। कोरोना के संक्रमण के चलते महादेव घाट पर श्राद्ध कराने कोई नहीं पहुंचा। लोगों ने अपने घरों में ही पूजापाठ की। अब हर दिन सुबह नहा-धोकर अर्पण-तर्पण किया जाएगा। रोज पशु-पक्षियों के लिए खाना भी निकाला जाएगा। इधर, ज्योतिषियों का कहना है कि जिन्हें प्रतिपदा और द्वितीया का श्राद्ध साथ में करना है वे गुरुवार को पितरों की पूजा कर सकते हैं क्योंकि 3 तारीख को दोनों तिथियां साथ पड़ रही हैं। वहीं 4 तारीख को कोई कुतुप मुहूर्त नहीं होने से श्राद्ध नहीं हो सकेगा।
ज्योतिषाचार्य डॉ. दत्तात्रेय होस्केरे ने बताया कि इस बार श्राद्ध पक्ष की तिथि को लेकर भी लोगों में भ्रम की स्थिति रही। वो इसलिए क्योंकि पूर्णिमा तिथि एक सितंबर की दोपहर से शुरू हो गई है। क्योंकि उदया तिथि मान्य होती है इसलिए श्राद्ध पक्ष 2 सितंबर से ही शुरू हो रहा है। बुधवार को दोपहर में प्रतिपदा यानी एकम तिथि प्रारंभ हुई। इस वर्ष श्राद्ध पक्ष में पावर्ण श्राद्ध निकालने का समय दोपहर 1:34 से 4 बजे तक रहा। हालांकि, कुछ ज्योतिषियों का यह भी कहना है कि जो लोग पूर्णिमा तिथि में श्राद्ध करते हैं, वे 1 सितंबर को अपने पूर्वज का श्राद्ध कर सकते थे।
स्नान-ध्यान कर तर्पण, पशु-पक्षियों को भोजन दें
श्राद्ध वाले दिन अल सुबह उठकर स्नान-ध्यान करने के बाद पितृ स्थान को सबसे पहले शुद्ध कर लें। इसके बाद पंडित बुलाकर पूजा और तर्पण करें। इसके बाद पितरों के लिए बनाए गए भोजन के चार ग्रास निकालें और उसमें से एक हिस्सा गाय, एक कुत्ते, एक कौए और एक अतिथि के लिए रख दें। गाय, कुत्ते और कौए को भोजन देने के बाद ब्राह्मण को भोजन कराएं। भोजन कराने के बाद ब्राह्मण को वस्त्र और दक्षिणा दें।
मृत्यु तिथि याद न हो तो अमावस्या में करें श्राद्ध
पूर्वजों का स्मरण और उनकी पूजा करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है। जिस तिथि पर हमारे परिजनों की मृत्यु होती है उसे श्राद्ध की तिथि कहते हैं। बहुत से लोगों को अपने परिजनों की मृत्यु की तिथि याद नहीं रहती ऐसी स्थिति में शास्त्रों में इसका भी निवारण बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार यदि किसी को अपने पितरों के देहावसान की तिथि मालूम नहीं है तो ऐसी स्थिति में आश्विन अमावस्या को तर्पण किया जा सकता है।
इस दिन इनका श्राद्ध...
1. पंचमी श्राद्ध
जिनकी मृत्यु पंचमी तिथि को हुई हो या जिनकी मृत्यु अविवाहित स्थिति में हुई है उनके लिए पंचमी तिथि का श्राद्ध किया जाता है।
2. नवमी श्राद्ध
इसे मातृनवमी के नाम से भी जाना जाता है। इस तिथि पर श्राद्ध करने से कुल की सभी दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध हो जाता है।
3. चतुर्दशी श्राद्ध
इस तिथि उन परिजनों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो जैसे कि दुर्घटना से, हत्या, आत्महत्या, शस्त्र के द्वारा आदि।
4.सर्वपितृ अमावस्या
जिन लोगों के मृत्यु के दिन की सही-सही जानकारी न हो, उनका श्राद्ध अमावस्या को किया जाता है।
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source https://www.bhaskar.com/local/chhattisgarh/raipur/news/there-will-be-16-days-of-worship-for-the-fathers-daily-rituals-then-food-for-animals-and-birds-127680174.html
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