अभाव को नहीं रोकने दिया रास्ता होनहारों ने टॉपर्स में बनाई जगह

मंगलवार को जारी हुए दसवीं बारहवीं के नतीजों ने कई दिलचस्प कहानियां सामने लाई हैं। इनमें ऐसे कई लगनशील विद्यार्थियों के बारे में पता चलता है जिन्होंने अभाव को अपने रास्ते का रोड़ा बनने नहीं दिया और मेरिट लिस्ट में जगह बनाई है। यहां हम दे रहे हैं ऐसी ही कुछ कहानियां जो अभाव के बीच पढ़ रहे विद्यार्थियों को आगे बढ़ने का हौसला दे सकती हैं।

माता-पिता की मेहनत रंग लाई
बिलासपुर में बहतराई के छात्र प्रदीप राजपूत ने दसवीं कक्षा में 96 फीसदी अंक हासिल किए हैं। प्रदीप के पिता राम गोपाल राजपूत रिक्शा चलाते हैं। मां गनेशिया बाई डीएवी स्कूल में झाड़ू-पोछा का काम करती हैं। प्रदीप ने बताया कि मां-पिता इस काम करते हैं, ये मुझसे देखा नहीं जाता। उनके लिए कुछ करना चाहूंगा।

ॉइसके बाद भी वे खुश होकर कहते हैं कि बेटा तुम पढ़कर जीवन में बड़े आदमी बनो। इसी उम्मीद के साथ मैं पढ़ाई में मेहनत करता हूं। लक्ष्य सिर्फ इतना है कि उनके सपने को पूरा करने के लिए कलेक्टर बनना चाहता हूं। मुझे पता है आईएएस की तैयारी करने में बहुत पैसे लगते हैं लेकिन कुछ भी करके माता-पिता के सपने को पूरा करूंगा। एनटीएससी में मेरा सेलेक्शन हुआ था। वहां से मुझे 1000 रुपए छात्रवृत्ति मिलती है, जो पढ़ाई के खर्च में काम आ जाती है।

मां को उसकी मेहनत का सिला देना है
छाेटी कोनी में रहने वाले राजकुमार मरावी की पुत्री दिव्या ने 10वीं में 95.1 फीसदी अंक हासिल किए हैं। उनके पिता ड्राइवर हैं, मां आंगनबाड़ी में काम करती हैं। मां के ऊपर काफी कर्ज है। साथ ही घर की आर्थिक स्थिति खराब है। मां ही पूरा खर्च चलाती हैं। दिव्या अब उनके लिए कुछ करना चाहती हैं।तीन बच्चों की पढ़ाई का बोझ मां के कंधों पर है। इस परेशानी को देखते हुए मैं रोज 4 से 5 घंटे पढ़ती रही। आगे और पढूंगी। कुछ बनकर उन्हें खुशी दूंगी।

मां की मेहनत का नतीजा है यह
बहादुर सिंह बताते हैं-एक साल का था तभी पता का निधन हो गया। फिर मेरी मां नीरा साहू ने मुझे रोजी मजदूरी करके पाला और पढ़ाया। वे आज भी सब्जी का बोझ ढोती हैं। आज मैंने 12वीं में जो 86.8 फीसदी नंबर हासिल किए हैं वो मां की मेहनत और शिक्षकों के सहयोग की बदौलत मिले हैं।अब यूपीएससी की तैयारी करूंगी लेकिन साथ में कुछ काम भी करूंगा। जैसा मल्टीपरपज स्कूल के छात्र बहादुर सिंह ने बताया।

पढ़ाई के साथ ट्यूशन भी पढ़ाया
सरकंडा की दिप्ती राज ने दसवीं में 93 फीसदी अंक पाए हैं। मां थैले सिलकर घर का खर्च चलाती हैं। पिता इस दुनिया में नहीं हैं। बड़ी बहन मॉल में काम करने घर खर्च मेंं हाथ बंटाती हैं। मैं भी छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हूं।

मां का सपना पूरा करना है
10वीं में 97.83 प्रतिशत पाने वाली महक यादव अपनी मां का सपना पूरा करना चाहती है जो दूसरों के घरों में खाना बनाने का काम करती हैं। माता सुशीला यादव चाहती हैं कि बेटी अच्छी नौकरी करे।
और अपने पैरों पर खड़े रहे। जब महक एक साल की थी तभी पिता की मृत्यु हो गई। इसके बाद मां ने काफी संघर्ष कर बेटी को पढ़ाया। बेटी की पढ़ाई प्रभावित न हो इसके लिए मां ने दूसरों के घरों में जाकर खाना भी बनाया। आज बेटी की इस सफलता पर मां की आंख भी भर आई। महक ने बताया कि हर सब्जेक्ट को शेड्यूल बनाकर पढ़ा। 3 से 4 घंटे की रोज पढ़ाई की। कभी किसी चीज का टेंशन नहीं लिया। शिक्षकों ने भी पढ़ाई के दौरान पूरी मदद की। 34 घंटे की पढ़ाई करती थी। शेड्यूल बनाकर पढ़ा, सभी सब्जेक्ट को बराबर समय देती हैं. हर डाउट को टीचर से पूछ कर किया दूर, कभी किसी का टेंशन नहीं लिया। हमेशा मां ने सपोर्ट किया। माता सुशीला यादव ने बताया कि पिता की जबडांस करना काफी पसंद है। स्कूल के हर एनुवल डे पर पार्टिसिपेट करती हूं।

नानी के घर रहकर की पढ़ाई
लाटाबोड़ की भारती यादव बचपन से ही अपनी नानी शिक्षिका चंद्रकिरण यादव के घर टेकापार में रहती हैं। अभावों के बीच रहते हुए उन्होंने मेरिट में जगह बनाई है।पिता रूम लाल यादव व माता मंजूषा यादव चंदखुरी में रहते हैं और वहीं कृषि कार्य करते हैं। मौसी दामिनी यादव बताती हैं भारती फोन, टीवी इन सब से दूर रहती है। रोजाना 4 किमी सायकल चलाकर स्कूल जाती थी। भारती ने बताया कि मुझे इंग्लिश और मैथ्स सब्जेक्ट बहुत अच्छा लगता है।

अभावों के बीच टीकेश ने पाई उपलब्धि

रायपुर| सरस्वती शिशु मंदिर उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, पेंडराकांपा, मुंगेली के छात्र टीकेश वैष्णव को बारहवी में पूरे राज्य में पहला स्थान मिला है। उन्हें 97.80 प्रतिशत अंक प्राप्त हुए हैं। इस उपलब्धि को लेकर स्कूल में हर्ष व्याप्त है। गौरतलब है कि विवेकानंद बाल कल्याण समिति से संचालित सरस्वती शिशु मंदिर उच्चतर माध्यमिक विद्यालय है। समिति के अध्यक्ष प्रकाश लोढ़ा (जैन) ने बताया कि टिकेश वैष्णव के टॉप आने की जानकारी से सम्पूर्ण मुंगेली में हर्ष व्याप्त है। स्व. फूलचंद जैन ने शिक्षा की गुणवत्ता के लिए ग्रामीण और वनवासी क्षेत्रों में आजीवन परिश्रम किया था। टिकेश वैष्णव निम्न आय वर्ग से आता है। इस सफलता से सरस्वती शिशु मंदिर के आचार्यों की गुणवत्ता और एकाग्रता भी उभर कर आई है।



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source https://www.bhaskar.com/local/chhattisgarh/raipur/news/no-way-to-stop-lack-127441718.html

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