शहर के प्राचीन जगन्नाथ मंदिर में 125 वर्षों पुरानी परंपरा कोरोना संक्रमण काल में बदलेगी। पूर्णिमा यानि 5 जून को देवस्नान पूजा होगी। इसके बाद 23 जून को रथ पर सवार होकर महाप्रभु, दाऊ बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ मौसी के घर जाएंगे।
रथोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता रहा है। देवस्नान, नेत्रोत्सव और रथयात्रा में हजारों लोग शामिल होते हैं लेकिन इस बार कोविड-19 से सुरक्षा को देखते हुए सीमित लोगों के साथ पूजा संपन्न होगी। समिति ने कहा, प्रशासन से 25 लोगों के साथ रथयात्रा निकालेंगे अनुमति मांगेंगे। जगन्नाथ भगवान रथ पर बैठकर दो दिनों तक शहर के लोगों को दर्शन देने जाते थे। परंपरा के मुताबिक पहले दिन पहंडी विजय पर राज परिवार के लोग रथ के आगे झाड़ू लगाते हुए छेरी पहरा यानी पानी छिड़कते हैं। सात परिक्रमा कर भगवान को रथ पर बैठाया जाता है। शहर में दो दिनों के रथ यात्रा की परंपरा है लेकिन इस बार प्रशासन से अनुमति लेकर 25 लोग जगन्नाथ मंदिर से मौसी गुंडिचा के मंदिर (गांजा चौक) ले जाया जाएगा। अनुमति नहीं मिली तो सादगी के साथ रथ को मंदिर से राजमहल तक ले जाकर परंपरा का पालन किया जाएगा।
स्नान के बाद 56 भोग, शाम को महाआरती
ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा (5 जून) पर भगवान को देवस्नान कराने की तैयारी शुरू हो गई है। स्नान मंडप बनाकर तैयार कर लिया गया है। हर साल इस अवसर पर 108 ब्राह्मणों द्वारा भगवान को स्नान कराया जाता। दोपहर में भंडारे में सैकड़ों लोग प्रसाद ग्रहण करते थे। शाम को ओडिशी नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रम होता था। इस बार सादगी के साथ 11 ब्राह्मणों द्वारा एक-एक कर स्नान कराया जाएगा। उन्हें 56 भोग करा कर, शाम में महाआरती की जगह शयन आरती होगी। इस दिन आम भक्तों के लिए भगवान के दर्शन सुलभ नही होंगे।
भक्तों के लिए खास बात
- कपाट बंद रहेंगे दर्शन अंदर जाकर नहीं कर सकेंगे।
- महाआरती नहीं की जाएगी, शयन आरती होगी।
- महाप्रसाद भंडारे का आयोजन नहीं किया जाएगा।
- रथयात्रा में भक्त शामिल नहीं होंगे।
- घर से ही ऑनलाइन पूजा देख सकते हैं।
Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today
source https://www.bhaskar.com/local/chhattisgarh/raigarh/news/rath-yatra-will-ask-permission-for-25-people-on-23-127372900.html
एक टिप्पणी भेजें