अखाड़ों में नागपंचमी पर रुद्रशिव की पूजा करने की 151 साल पुरानी परंपरा इस बार टूटते-टूटते रह गई। शनिवार सुबह दंतेश्वरी अखाड़े में महज एक घंटे के भीतर मिट्टी से रुद्रशिव की प्रतिमा बनाकर पूजा की गई। हालांकि, संभवत: यह पहला ऐसा मौका भी रहा जब इस पर्व पर शहर के सभी शिवालय सूने रहे। दंगल का दांव भी कहीं नहीं लगा। मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए लोगों ने घर में ही शिव और नाग सर्प की पूजा की।
दरअसल, अखाड़े की जिस मिट्टी पर पहलवान सालभर कुश्ती करते हैं वह नागपंचमी से 4-5 दिन पहले निकाल ली जाती है। इससे रुद्रशिव की प्रतिमा बनाकर पूजा की जाती है। लॉकडाउन के चलते 151 साल पुराने दंतेश्वरी अखाड़े की मिट्टी इस बार नहीं निकाली जा सकी थी। परंपरा टूट न जाए इसलिए शनिवार सुबह कुछ पहलवानों ने मिलकर घंटेभर में अखाड़े की मिट्टी से रुद्रशिव काे आकार दिया। पूजन-अनुष्ठान जल्दी से पूरा कर अखाड़ा बंद कर दिया गया। इसी तरह गुढ़ियारी में भी परंपरा का निर्वहन करने के लिए कुछ देर अखाड़ा खोलकर पूजा की गई।
जानें इतिहास... मनोरंजन के कम साधन थे तब शुरू हुई थी कुश्ती
जानकार बताते हैं कि तकरीबन डेढ़-दो सौ साल पहले जब मनोरंजन का कोई साधन नहीं था। होली-दिवाली जैसे त्योहार लोग अपने परिवार के साथ मनाते थे। नागपंचमी ऐसा त्योहार था, जब लोग इसमें व्यस्त नहीं रहते थे। इस दिन दंगल करवाए जाने लगे। कुश्ती का आकर्षण बढ़ाने के लिए अखाड़े बनाकर कुश्तियों पर इनाम दिए जाने लगे। ज्यादातर अखाड़े उसी दौर में बने। बदलते दौर में भले ही इस पर लोगों की दिलचस्पी कम होने लगी है। कई अखाड़े बंद हो गए, लेकिन जो बचे हैं, वहां आज भी नागपंचमी पर रौनक लौट आती है।
इधर... महामारी से मुक्ति के लिए प्रार्थना की
इस मौके पर लोगों ने घर की दीवारों पर चित्र बनाकर या पूजा कमरे में प्रतिमा स्थापित कर नाग की पूजा की। लोगों ने काल सर्प दोष से मुक्ति के लिए अनुष्ठान भी किए। इसी तरह मंदिरों में अलग-अलग दोषों के निवारण के लिए पूजा की गई। सुरेश्वर महादेवपीठ में ब्राह्मणों ने मिलकर कोरोना महामारी से विश्व को मुक्ति दिलाने के लिए अनुष्ठान किया। इस दौरान स्वामी राजेश्वरानंद, पं. रविकांत तिवारी, पं. बुद्धि विलास, गौतम पंडित, शशिकांत पांडे, पं. नागेश शर्मा आदि मौजूद रहे।
Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today
source https://www.bhaskar.com/local/chhattisgarh/raipur/news/the-151-year-old-tradition-of-the-akhadas-is-not-broken-so-rudra-shiva-made-of-clay-in-an-hour-and-worshiped-the-temples-are-listened-worshiped-from-house-to-house-nagdev-127552710.html
एक टिप्पणी भेजें