उत्तम तप धर्म वह है जिसमें परमार्थ के अहंकार का त्याग किया जाता है। तप से ही मुक्ति के द्वार खुलते हैं। तब पकने (परिपक्व होने) की प्रयोगशाला है। जो तपता नहीं वो पकता नहीं। आत्मा की शुद्धि तपश्चरण से होती है। तपने के बाद ही आत्मा परमात्मा बनती हैा। यही दशलक्षणों में आठवां धर्म उत्तम त्याग धर्म है। यह बात दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे पर्यूषण पर्व के दौरान श्रीजी की पूजा, अभिषेक व आरती के दौरान जैन मिलन समिति के मीडिया प्रभारी दिनेश जैन ने कही। उन्होंने कहा कि अक्सर लोग दान को ही त्याग समझ लेते हैं।
त्याग के नाम पर दान के ही गीत गाए जाते हैं, जबकि जिनागम में दान को ही त्याग कहा गया है। दान देने की प्रेरणा भी भरपूर दी गई। दान की भी त्याग में अपनी उपयोगिता है, लेकिन जब गहराई से विचार किया जाए तो दान और त्याग में बड़ा अंतर है। त्यागियों के पास रंच मात्र भी परिग्रह नहीं होता जबकि दानियों के पास ढेर सारा परिग्रह होता है।
दिनेश जैन ने आठवें धर्म उत्तम तप के बारे में जानकारी देते हुए समाज के लोगों को जीवन में आत्मसात करने कहा। समाज के लोग भी संकल्प लेकर धर्म को अपनाने की बात कही। पूजन में अखिलेश जैन, नवोदित जैन, मुकेश सिंह, देवेन्द्र जैन, मुकेश जैन, सपना लहरी, सत्येन्द्र जैन आदि ने सहयोग किया।
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source https://www.bhaskar.com/local/chhattisgarh/bilaspur/korba/news/abandoning-the-ego-of-paramarth-is-the-best-austerity-religion-celebrating-paryushan-festival-in-jain-temple-127670407.html
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